भोले शंकर (22)

बेरोज़गारी से दो दो हाथ...

Pankaj Shukla : Director of Bhole Shankar

फिल्म भोले शंकर की कहानी अब तक आप लोगों को काफी कुछ साफ हो चुकी होगी. ये कहानी एक विधवा मां और उसके दो बेटों की है. ये कहानी बताती है कि कैसे एक बेसहारा मां अपने बच्चों को अपने बल बूते पाल पोस कर बड़ा करती है. ये कहानी बताती है कि कैसे समाज के उसूल एक औरत से उसकी शादीशुदा ज़िंदगी का सुख छीन लेते हैं. और, ये कहानी ये भी बताती है कि अगर इंसान चाहे और परिवार का साथ मिले तो गांव का भी एक बच्चा पढ़ लिखकर अपने बूते कुछ बन सकता है. इसके लिए ज़रूरी नहीं कि वो सरकारी नौकरी ही करे, बेरोजगारी अपने देश की बड़ी समस्या है और इससे देश के किसी भी कोने का युवा वर्ग अछूता नहीं है. लेकिन अगर आज के युवा बजाय सीधी सादी सरकारी नौकरी के, किसी हुनर में अपना हाथ साफ करें, तो रोज़गार के अवसर आज भी कम नहीं हैं. चूंकि मेहनत का रास्ता कठिन और परेशान कर देने वाला होता है, लिहाजा कई बार बुरी संगत में पड़कर शंकर जैसे लोग गलत रास्तों पर भी निकल जाते हैं, लेकिन भोले जैसे लोग चाहें तो राह भटके लोगों को भी फिर से विकास की मुख्यधारा में जोड़ सकते हैं.

इधर भोले शंकर की मेकिंग हर दिन आप तक नहीं पहुंच पा रही है. इसके लिए मैं आप लोगों से माफी चाहता हूं. कुछ नित्य जीवन की उठा पटक और कुछ मां के एक दुर्घटना में चुटहिल हो जाने के कारण मेरा समय अन्यत्र लग गया. मुंबई से मीलों दूर लखनऊ के पास एक छोटे से गांव फतेहपुर चौरासी में मेरी मां रहती हैं मेरे पिताजी के साथ. दोनों लोगों से हम कई बार अनुरोध कर चुके हैं, हमारे साथ रहने का. लेकिन, अपनी मिट्टी से इन लोगों के लगाव के आगे हमारी हर ज़िद हार जाती है. मैं पिछले कई दिनों से मां के साथ ही था, और हमारा गांव ऐसी जगह है जहां हर प्रोडक्ट की दावेदारी कसौटी पर कसी जाती है. रिलायंस वाले भले अपने नेटवर्क को हवा और पानी की तरह हर जगह मौजूद बताते हों, लेकिन हमारे गांव आकर ये दावा भी खोखला साबित हो जाता है. और अंजोरिया तक मेरे आलेख इंटरनेट के ज़रिए ही पहुंच सकते हैं. तो ना तो रिलायंस का नेटवर्क मिला और ना ही मैं अंजोरिया के लिए आलेख भेज पाया.

वैसे इस बार सुना कि गांव के करीब गंगाजी के किनारे होकर गंगा एक्सप्रेसवे निकलने वाला है, हो सकता है गंगा कटरी के दिन इसी बहाने बहुर जाएं. ये वो गांव हैं जहां आज इक्कीसवीं सदी में भी मूलभूत सुविधाएं किसी सपने जैसी बनी हुई हैं. चुनाव आते हैं, वादे होते हैं, लेकिन नेताओं की गाड़ियों के गुबार की तरह हर बार पीछे रह जाते हैं आम लोगों के सपने. ऐसा ही एक सपना फिल्म भोले शंकर के भोले ने देखा है. लेकिन मां की संगीत से दूर रहने की ज़िद के आगे उसने अपना सपना कुर्बान कर दिया. दोस्त यार सब जानते हैं कि भोले बढ़िया गाता है. भोले के गुरुजी भी चाहते हैं कि किसी दफ्तर में क्लर्की या खेत में किसानी करने की बजाय भोले अपने इस हुनर को रियाज़ से मांजे और गांव का नाम पूरी दुनिया में रौशन करे. लेकिन, मां की मर्जी जब तक नहीं होती, वो भला कैसे मीलों दूर मुंबई जा सकता है.

Manoj Tiwari.

स्टेज पर गाना गावे का तईयारी में भोले (मनोज )

तमाम असमंजस के बाद मां भोले को मुंबई जाने की इजाज़त दे भी देती है, लेकिन शोहरत के शिखर पर पहुंचना आसान नहीं होता. जैसा कि मैं पहले भी लिख चुका हूं कि भगवान कोई बड़ा ईनाम देने से पहले हमारी काबिलियत का इम्तिहान ज़रूर लेता है, भोले की भी ऐसी ही परीक्षा होती है. और, लखनऊ में गानों की शूटिंग के बाद हमें करनी थी उस सीन की शूटिंग जिसमें भोले के सब्र का ये इम्तिहान होना है. भोले ने अपनी गायिकी के गुण दिखाकर म्यूज़िक कंपनी के अफसरों का दिल तो जीत लिया है, लेकिन म्यूज़िक कंपनी चाहती है कि भोले भोजपुरी रैप तैयार करे. रैप का वैसे तो दूसरी लोक भाषाओं से संगम हो चुका है, ये वो विधा है जिसके ज़रिए आज की पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ने की कोशिश करती है. पंजाबी की पश्चिमी देशों में लोकप्रियता की एक बड़ी वजह ये भी है, वहां की पुरानी पीढ़ी ने आज के नौजवानों को अपने लोकगीतों को उनके हिसाब से ढालने की मोहलत दे दी है. पंजाबी पॉप और रैप का कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों में इस तरह के संगीत का भरा पूरा बाज़ार है. और, अब वक्त आ गया है जब भोजपुरी को भी विदेशों में पली बसी नई पीढ़ी से जोड़ा जाए. इसी सोच के मद्देनज़र हमने फिल्म भोले शंकर में एक भोजपुरी रैप सॉन्ग भी रखा है.

और, आज जिस दृश्य की मैं बात करने जा रहा हूं वो फिल्म में ठीक इस भोजपुरी रैप के पहले आता है. ये वो सीन है जब भोले मुंबई में शंकर के घर से तैयार होकर निकलता है और उसे शो से पहले रिहर्सल करना है. रिहर्सल से ठीक पहले कैसे शंकर की असलियत भोले के सामने खुलती है, इसकी चर्चा बाद में कभी होगी. आज इस सीन की बात. तो भोले घर से निकलकर हॉल में पहुंच चुका है. ना मां को पता है कि भाइयों के बीच क्या हुआ और ना ही गुरुजी जानते हैं कि भोले परेशान क्यों है? ये पूरा सीन करीब 18 शॉट्स में पूरा हुआ, जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं कि भोजपुरी सिनेमा में किसी सीन को कम से कम शॉट्स में पूरा करने की परंपरा चली आ रही है और शायद इसीलिए भोजपुरी सिनेमा को वो दर्जा अब तक हासिल नहीं हुआ जो बस एक एक प्रदेश की भाशा होने के बावजूद तमिल, तेलुगू और