भोले शंकर (17)

कॉलेज में हुड़दंग

Pankaj Shukla : Director of Bhole Shankar

लखनऊ में कुर्सी रोड से थोड़ा आगे जाकर उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी गिरीश बिहारी सक्सेना द्वारा संचालित एक बहुत ही विशाल इंस्टीट्यूट है- इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेशल एजूकेशन. इसी कैंपस में मीडिया की पढ़ाई भी होती है और छात्रों को कैमरे के पीछे और आगे की तकनीक सिखाई जाती है. शहर से दूर होने और इसके कैंपस में हर तरह की सुविधाएं होने की वजह से मैंने इस इंस्टीट्यूट का चयन फिल्म की शूटिंग के लिए किया. ज़ी न्यूज़ में मेरे एक अभिन्न सहयोगी हैं अश्वनी कुमार. अश्वनी के पुराने मित्र सुधीर रिंटेन आईआईएसई में उच्च पद पर हैं और सक्सेना जी उनका आदर भी बहुत करते हैं. रिंटेन से मैं शूटिंग से काफी पहले मिलकर आया था और उन्होंने शूटिंग के वक्त हर तरह की सहूलियत मुहैया कराने का वादा किया तो मैंने फिल्म के कैंपस सीन यहीं शूट करने का मन बना लिया.

Manoj Tiwari and group.

"नाक के नथिया नाभ पे आई, अब का छेदाई आहे दादा" - भोले (मनोज तिवारी) बन गया सुपर स्टार

गांव लुधमऊ से सारा माल असबाब समेट कर हम लोग आईआईएसई पहुंच गए और वहां रिंटेन ने हमारी मुलाकात अपने कुछ सहयोगियों से कराई. एक तो थे मामाजी और दूसरे राजेश गौर. राजेश खुद एक भोजपुरी फिल्म में काम कर चुके हैं और लखनऊ के स्थानीय कलाकारों के सीधे संपर्क में थे. राजेश के साथ मिलकर मैंने लखनऊ के तमाम स्थानीय कलाकारों का ऑडीशन पहले भी लिया था और भोले के दादा के रोल के लिए डॉ मुजम्मिल खान, सरपंच के रोल के लिए नरेंद्र पजवानी, गौरी की मां के रोल के लिए नीतू पांडे, पार्वती की मां के रोल के लिए अर्चना शुक्ला, भोले के पिता जी के रोल के लिए राजेश गौर और पार्वती के पिता के रोल के लिए इलाहाबाद के मिश्रा जी को फाइनल किया.

खैर, हम इंस्टीट्यूट पहुंचे तो वहां छात्रों में हंगामा हो गया, ये पहला मौका था जब वहां किसी फीचर फिल्म की यूनिट पहुंची थी. आईआईएसई के अंदर दो विशाल हॉल भी हैं, जहां हमें फिल्म के दो खास गाने शूट करने थे. जैसा कि अमूमन होता है हर कॉलेज में दबंग छात्रों का एक समूह होता है जो कैंपस में हर हाल में अपना दबदबा कायम रखना चाहता है. ऐसा ही हमारे साथ भी हुआ, कोई पांच छह छात्रों ने शूटिंग में दिलचस्पी लेनी शुरू की, लेकिन उनकी ज़्यादा दिलचस्पी फिल्म के हीरो मनोज तिवारी के ज्यादा से ज्यादा करीब रहने में थी. उनकी वजह से शूटिंग में दिक्कतें भी आ रही थीं. तो मैंने अपने कॉलेज दिनों की याद करते हुए एक फैसला किया. गांव में भी कहावत है कि चोर के हाथ में चाभी दे दो तो सामान ज़्यादा सुरक्षित रहता है, तो मैंने इन छात्रों के हवाले ही कैंपस में चीज़ों की देखरेख का जिम्मा दे दिया और सुधीर रिंटेन ने भी इस काम में मेरी काफी मदद की. छात्रों के इस ग्रुप को फिल्म में मनोज तिवारी के दोस्तों के किरदार भी दे दिए गए. तो अब कभी वो पासिंग शॉट्स देते नज़र आने लगे तो कभी किसी गाने में हिस्सा लेते. जवानी के जोश और इसकी ऊर्जा को सही रास्ते पर लगा दिए जाते तो क्या कमाल हो सकता है, इसकी मिसाल फिल्म भोले शंकर की शूटिंग के दौरान मैंने अपने सहयोगियों को समझाई.

Manoj Tiwari and group.

भोले की मस्ती में दोस्तों का साथ

फिल्म भोले शंकर के क्लाइमेक्स में भोले को एक टकाटक भोजपुरी रैप पर परफॉरमेंस देनी होती है. वैसे तो भोजपुरी रैप नई चीज़ नहीं है. और चटनी म्यूज़िक के तौर पर इसके आगे की चीज़ें भी सामने आ चुकी हैं. लेकिन किसी मेन हीरो पर भोजपुरी फिल्म में रैप का एक्सपेरीमेंट पहली बार भोले शंकर में ही होने जा रहा है. इस रैप सॉन्ग की शूटिंग हमने तीन दिन में पूरी की. गाना आज के फैशन पर कटाक्ष करता है- नांक के नथिया नाभ में आई, अब का छेदाई आह दादा. और इस गाने के दौरान भोले के दोस्त संतराम, गौरी, मां और गुरूजी की भी मौजूदगी कहानी के लिहाज से ज़रूरी थी. लेकिन इन चारों की डेट्स तीनों दिन के लिए हमें मिल नहीं पा रही थीं. तो हमने पहले मां और गुरूजी का काम निपटाया. फिल्म में जब आप ये गाना देखेंगे तो आपको पता ही नहीं चलेगा कि जब मां और गुरूजी अपनी खुशी का इज़हार कर रहे हैं तो उस समय मनोज तिवारी गाना गा ही नहीं रहे हैं. दोनों हिस्से अलग अलग शूट हुए हैं और बाद में एडीटिंग के दौरान दोनों को इस तरह मिलाया गया है कि परदे पर देखते हुए पता ही नहीं चलता कि इन सीन्स की शूटिंग अलग अलग दिनों में हुई है. यही सिनेमा है और यही है सिनेमा का मायाजाल. बाकी अगले अंक में, पढ़ते रहिए कइसे बनल भोले शंकर?

कहा सुना माफ़,

पंकज शुक्ल
निर्देशक- भोले शंकर

(पाठक अपनी प्रतिक्रियाएं पंकज शुक्ल को pankajshuklaa@gmail.com पर भेज सकते हैं)

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